जहाँ खनिजों की चमक से समृद्ध झारखंड की धरती विकास की कहानियाँ कहती है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाल तस्वीर कई बार मानवता को शर्मसार कर देती है। पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर अनुमंडल अस्पताल से सामने आई एक घटना ने न केवल अस्पताल प्रबंधन की संवेदनहीनता को उजागर किया है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
यहाँ एक नवजात की मौत के बाद पिता को शव को डिब्बे में रख-बाँहों में भर लेकर जाने को मजबूर होना पड़ा—कोई शव-वाहन नहीं, कोई सम्मान-पूर्ण व्यवस्था नहीं। यह घटना सिर्फ एक परिवार की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है जिसमें गरीब और जरूरतमंद लोग सबसे अधिक पीड़ित होते हैं। बताया जा रहा है कि अस्पताल में एक नवजात शिशु की मौत हो गई। इसके बाद जो हुआ, उसने मानवता को झकझोर कर रख दिया।
परिजनों के अनुसार, नवजात की मृत्यु के बाद अस्पताल प्रबंधन ने उन्हें जल्द से जल्द शव को अस्पताल परिसर से ले जाने के लिए कहा। लेकिन जब परिवार ने शव को घर ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था की मांग की, तो अस्पताल की ओर से किसी प्रकार की मदद नहीं की गई। न तो एम्बुलेंस उपलब्ध कराई गई और न ही किसी अन्य वाहन की व्यवस्था की गई।
मजबूरी और असहाय स्थिति में नवजात के पिता को अपने बच्चे के शव को एक कार्डबोर्ड के डिब्बे में रखना पड़ा। उस मासूम को, जिसे दुनिया में आने के बाद माता-पिता की गोद और प्यार मिलना चाहिए था, उसकी अंतिम यात्रा एक साधारण डिब्बे में तय करनी पड़ी। पिता ने उस डिब्बे को अपनी बाँहों में थाम लिया और ई-रिक्शा की सवारी कर बंदगांव प्रखंड के नकटी गांव तक का सफर तय किया।
यह दृश्य सिर्फ एक परिवार के दर्द का प्रतीक नहीं था, बल्कि पूरे समाज के सामने खड़ी उस सच्चाई का आईना था, जिसमें गरीब की पीड़ा अक्सर व्यवस्था की उदासीनता में दब जाती है। अस्पताल परिसर से लेकर रास्ते तक जिसने भी यह दृश्य देखा, उसकी आँखें नम हो गईं।
राज्य के स्वास्थ्य ढांचे से जुड़े आंकड़े भी इस घटना की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हैं। रिपोर्टों के अनुसार झारखंड के ग्रामीण अनुमंडल अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 40 प्रतिशत से अधिक पद खाली पड़े हैं। कई अस्पतालों में नवजात शिशुओं के लिए पर्याप्त नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। संसाधनों की कमी, स्टाफ की कमी और व्यवस्थागत लापरवाही मिलकर ऐसी घटनाओं को जन्म देती हैं।
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक गरीब परिवारों को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। क्या अस्पतालों में शव-वाहन जैसी बुनियादी व्यवस्था भी सुनिश्चित नहीं की जा सकती? क्या प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस घटना से सबक लेकर भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएंगे?















